शुक्रवार, 4 सितंबर 2009
मेरी किवता
आजकल
कुछ कमी सी लगती है
इन कानों केा
इन नथुनों को
लगता है जैसे
कुछ लगातार
घट रहा है,
धरा को श्राप है
जेा कम होना चाहिये
वह बढ रहा है---
खून खराबा प्रदूशण जहर द्वेश ,
जेा बढना चाहिये
वह घट रहा है
प्रेम षांति विष्वास
....किरण राजपुरोहित नितिला
बुधवार, 2 सितंबर 2009
शनिवार, 29 अगस्त 2009
मेरी कविता
वेा मेरे अंतस में छुपा रहा
मैं दर दर सिर पटकता रहा
सारी उमर यूं मासूम बना
वो मुझे रोज ही ठगता रहा
देखा जब भी प्यार से उधर
अजनबी सा ही तकता रहा
बांटना चाहा दर्द उसके
क्यूं मेरे हाथ झटकता रहा
म्ेारी सूरत ही है ऐसी
जिंदगी भर ये समझता रहा
देखा सदा मतलब से अपना
मैं बस यही षुक्र मनाता रहा
साथ मेरे वो मेरा साथी
इन खयालों में भटकता रहा
-किरण राजपुरोहित नितिला
बुधवार, 26 अगस्त 2009
मेरी किवता
मुड़े हैं जिंदगियों के पन्ने
वक्त उन्हें उधेड़ता बुनता रहा
दंगाइयों के कहकहे सुन कर
जमीं का बदन हरहराता रहा
क्यूं है क्या है कौन है??
प्रष्न सदैव पूछते रहे
थका सा सूरज उगा लज्जित सा
और दोपहर तिलमिलाती है
आस्था के आंगन में
तुच्छ रोषनी झिलमिलाती है
यादों के पिछवाड़े में सदा
मोरमन मौन कूकते रहे
किलकारी ही कत्ल न हो
मां हर पल मन्नत यही मांगती
जवानियों के ज्वार न भटके
आषीशें हर रात जागती
बदलेगा इंसान यद
िविष्वास ये गूंजते रहे!!! ----किरण राजपुरोहित नितिला
सोमवार, 24 अगस्त 2009
शनिवार, 22 अगस्त 2009
प्ंखों को जरा लरज़ा बिटिया
बाहर नीला आसमां बिटिया
मेरेे अरमान तेरे दिल में
अब खुली हवा दिखा बिटिया
मौसम अड़चनें देता रहेगा
मुष्किलें से न घबरा बिटिया
आंचल भर भर आषा और आषीश है
करेगा तेरी रक्षा बिटिया
अहंकार उसमें हो कितना ही
तेरे दम से दुनिया बिटिया
देख अपनी जड़ें खोद कर वो
इतरा रहा है कितना बिटिया
बैठा घात लगाए सदियों से
पर तू भी है सबला बिटिया
-किरण राजपुरोहित नितिला
गुरुवार, 20 अगस्त 2009

छू कर मेरे मन को
-हमेषा सच बोलोगे तो ध्यान नही रखना पड़ेगा कि कल क्या बोला था।
-एक सच्चा हदय सारे संसार को विलक्षण षक्तियों से अधिक मूल्यवान है।
-जिस तरह आग से आग नहीं बुझती उसी तरह पाप से पाप खत्म नही होता ।
-बुद्धि के लिये अध्ययन इतना ही आवष्यक है जितना षरीर के लिये व्यायाम।
-कुछ लोग अच्छे अवसर खोर ही महान्बनते है।
बुधवार, 19 अगस्त 2009

मैं छाया हूं!!!
हर एक का रोषनी में साया हूं
सुख में मुझे देखते नही
चेहरा उपर किये
अनदेखी किये जाते है,
पीछा करती हूं फिर भी
रौंदना चाहते है पैरों से
सरकती जाती हूं मैं
साथ सब छोड़ देते है
रहती हूं तब भी मैं
भंगुर से मोह बंधाते हैं
लेकिन चिता मंे भी साथ देती हूं मैं
अंधेरे में न दिखूं
हूं तब भी मैं
अमीर गरीब बूढा जवान
भेद नही तनिक करती मैं
सबका साथ निभाती जाती मैं
सूर्य की सहचरी हूं मैं
सृश्टि के पहले कण से
अस्तित्व में हूं मैं
हर वस्तु
हर अकार प्रकार
हर प्राणी का अभिन्न हूं मैं
सुख दुख में भी समान प्रेम है
प्राणी से,
लेना कुछ नही है मुझे
इस तुच्छ प्राणी से
निस्वार्थिनी हूं मैं !1
सहभागिनी हूं मैं!!
-किरण राजपुरोहित नितिला
रविवार, 2 अगस्त 2009

म्ेहनत का सार लघु कथा
एक बार महादेव को दुनिया पर बहुत क्रोध आया। षंख नही बजायेेगंे। महादेव षंख बजायें तो बरसात हो। अकाल पर अकाल पड़ा। पानी की एक बूंद भी नहीं बरसी। दुनिया बहुत कलपी बहुत पा्रयष्चित किया पर महादेव टस से मस नही हुए।
एक बार महादेव और पार्वती आकाष मार्ग से कहीं जा रहे थे। क्या देखते हैं ऐसे भयंकर सूखें में भ्ी एक जाट खेत जोत रहा है । एडी से चोटी तक पसीने सराबोर। भोले बाबा के अचरज का पार नही। बरसात हुए तो जमाना हुआ । फिर यह खेत में क्या कर रहा है? इसका दिमाग तो नही चल गया?
विमान से उतर कर चैधरी के पास गये। पूछा ‘‘ पगले क्यों बेकार मेहनत कर रहा है? सूखी धरती में पसीना बहाने से क्या लाभ! पानी का तो सपना भी दुर्लभ है ’’
चैधरी बोला ‘‘ ठीक कहत हो,पर जोतना भूल न जाउं इस लिए हर साल खेत जोतता हूं। जोतन भूल गया तो पानी बरसा न बरसा बराबर।’’
बात महादेव को भी जंची पर सोचा अरसा हुआ मैंने भी षंख नही बजाया। कहीं बजाना भूल तो नहीं गया?’’
वहीं खड़े खड़े षंख जोर से बजाया और चैफेर घटाएं घुमड़ी । बेहिसाब पानी बरसा।
आभार श्री विजयदान देथा

नियति..........
एक दिन
नियति
अपने नियत काम
छोड़ कर
कुछ बुनने बैठ गई
मखमली सुनहरी डोरी से
मेरा भाग्य लिख
सतरंगे तारें सी चुन्नटें डाल
रेष्मी धागे
से सहला दिया
मेरी छोटी सी मुलायम जिंदगी बुनी
गुलाबी दिन बुने
और
भीनी ख्ुष्बू की फुहार दे
दो घड़ी ठिठक निहरने लगी
सोच तनिक!
छत के बरामदे में कूंची ले खड़े
रंगों के छींटे से
और मोहक लगते
गोरे चिट्रटे लड़के पर फिरा दिया!
-----------किरण राजपुरोति नितिला
शनिवार, 1 अगस्त 2009

स्मृतियों के चलचित्र
स्मृतियों
का किवाड़
थपथपाता है
कभी कभी ये मन
फुर्सत में
अतीत को जीवंत करने
बैठ जाता है ये मन,
ये गहरा मन
दुहराता है
स्मृतियों के
चलचित्र
मानस पट पर उभरते है
वे चेहरे जो
आपधापी में विस्मृत से हेा गये
अब जाने क्यूं
याद आकर
भले भले से लगते
अपनापन लिये हुये,
लगता!
इन्हें इस तरह
बीत जाना जान कर
मुठ्रठी में भींच कर
क्यूं न रख लिया,
बचपन का हर पल
याद भले नहीं
लेकिन कई चेहरे
अब याद कर कर के
एक प्रष्न के
सटीक उत्तर की भांति
रटे जा चुके हैं,
जब चाहा
मानस में आकर
बैठ जाते हैं वे
और यादों की
नटखट खिड़कियां
खुल खुल जाती है
वर्षों पुरानी
सुगंधित हवा
नथुनों में
तैरती सी लगती है
फिर से जानी पहचानी
और पुराने चलचित्र
लड़खड़ा कर संभलने लगते है!!!!!
.........किरण राजपुरोहित नितिला
शनिवार, 18 जुलाई 2009

झिलमिल रात
चंाद ने मुस्करा कर
तारों ने झिलमिला कर
खिलखिलाकर
रात का स्वागत किया
चांद तारे अैार रात
मिल कर गुनगुनाने लगे
चांदनी की लय पर
धरती झूमने लगी
रात रानी महकने लगी
नन्हे तारों से
झिलमिल हुई धरती
जुगनु से चमकती
दमकती चूनर ओढ़
यामिनी चली
ठुनक ठुनक
हौले हौले
गगन ने गवाक्ष से
झुक झुक चुपके से झांका
तेा रोका !
घड़ी पलक ठहर जाओ
घन का घनन घनन
गान सुनती जाओ!
-किरण राजपुरोहित नितिला
बुधवार, 15 जुलाई 2009

तुमको मैंने!!!!़़़़़़़़़़़़़़़़़............
दुनिया की भीड़ में
जब भी अकेली हुई मैं
साथी बना पाया तुमको,
अंधेरी रात में एकाकी हुई
चांद बने पाया तुमको,
चिलचिलाती धूप ने झुलसाया
छांव बने पाया तुमको !!!
सावन की तपन ने घेरा
रिमझिम बरसे पाया तुमको !
गीत लिखा जब भी कोई
कलम ने हर बार गाया तुमको
सितार हुआ मिजराब से झंकृत
हर सुर में पाया तुमको
बंद बांखों की खिड़की से झांका
अपने ही भीतर पाया तुमको!!!!!!!!!!!
...........ििकरण राजपुरोिहत ििनितला
रविवार, 12 जुलाई 2009
शुक्रवार, 10 जुलाई 2009
किवता
प्रियतम तुम......................
जबसे हुये हो
तुम
दृष्टि से ओझल
इन नैनों में बस गये हो,
पलकों केा क्यूं झपकाउं मैं
स्वपन में भी बसे हो
तुम
हाथ छुड़ा कर गये जिस पल
और गहरे उतर गये हो
तुम
हलचल सी हेाती है
तन मन में
अपने खयालों में मुझे
जब
छूते हो हौले से,
मुझे न सही
मेरी तस्वीर ही देख लो
ये सूजी आंखें
पुकारेंगी तुम्ही को
रोम रोम की यही पुकार है
एक बार आ जाओ तुम
चांदनी में चांद को
मैं देखूंगी
उसी पल
देखना तुम
मेरी व्यथा वही कहेगा तुमसे
समझना तुम
और कुछ कहना तुम..............
किरण राजपुरोहित नितिला
मंगलवार, 7 जुलाई 2009
पिताजी अंटी में
लघु कथा
बनिये का बच्चा दस बरस की उम्र के बराबर अकल साथ ले कर जनमता है। बोलना सीखता है तब तक तो अकल उसके पांवों में लोटने लगती है। एक बनिये के एक ऐसा ही होशियार बेटा था। सातवें बरस तो वह बेखटके दुकान का सारा काम करने लगा कम तौलना, कम नापना और झूठ बोलना । पिता को जब पूरा भरोसा हो गया तो वह सारे दिन वसूली करने लगा। दुकान की देहरी पर भी नहीं चढता था। लोगबाग बच्चे को ठगने की सोच कर आते पर ख्ुाद ठग जाते थे। फिर भी मजाल है जो पता चल जाये।
एक दिन एक जाट सौदा सुलुफ के लिए आया। छोरे को अंगुली से दिखा कर बोला
‘‘एक रुपये का मालवी गुड़ तौल दे।’’
जाट ने सोचा मांगेगा तो रुपया दे दूंगा नहीं तो उधार है ही । छोरे ने सोचा सबेरे सबेरे कौन उधार करे ! नकदनारायण का आसामी नहीं देख कर छोरे ने कहा ‘‘पिताजी वसूली पर गये है। सांझ को आयेगें । मुझे भाव मालूम नहीं।’’
छोरे की होशियारी देख कर जाट को गुस्सा आ गया। झट से रुपया निकाल कर कहा
‘‘पिताजी मेरी अंटी में है। यह ले!’’ यह कर उस ने रुपया उस की ओर उछाल दिया। कहा, ‘‘अब फुरती से तौलता हुआ नजर आ!’’
--------- विजयदान देथा
रविवार, 5 जुलाई 2009

छू कर मेरे मन को
-किसी भी व्यक्ति के लिये स्वयं केा खुद की ही बेड़ियों से आजाद कर पाना सबसे कठिन होता है। ऐसा नही होता तो शराब व सिगरेट की कंपनियां कब की बंद हो चुकी होती ।
-हम जब से जन्म लेते है तब से ही मां बाप के जीवन का लक्ष्य बन जाते है। उनके सपनों की सूची में हमारी सफलता सबसे उपर होती है और वे इसके लिये जी जान से मेहनत करते है। हम ये सब इसलिये नही समझ पाते क्यों कि हम इस अनुभव से नही गुजरे होते है।
-हमारे माता पिता की किसी मामले में गलत होने की संभावना हमसे बहुत कम होती है क्योंकि वे दुनिया को हमसे बेहतर तरीके से समझते है।
-जिंदगी की रफतार इतनी तेज न होने दें कि किसी की मदद की गुहार भी आप तक न पहंुच सके।
मंगलवार, 30 जून 2009
लोक कथा

सौ का भाई साठ- राजस्थानी लोक कथा
एक बनिया एक जाट में सौ रुपये मांगता था। जाट की साख् अच्छी नहीं थी। बस चलते लिया हुआ रुपया वापस नहीं देता था। हर बार कोई न कोई बहाना गढ लेता था। एक बार बनिये ने ज्यादा तकाजा किया तो जाट ने कहा
‘‘बही ले कर घर आ जाना। आज हिसाब साफ कर दूंगा।बहुत दिन हुए आप को चक्कर लगाते हुए।’’
सेठ खुशी खुशी बही ले कर उस के घर गया। सोचा,आज चैधरी को जब्बर सुमत सूझी !सनकी के जंच गयी सो भली। जाट ने सेठ के पास खड़े होकर कहा ‘‘क्यों सेठजी मेरे खाते में सौ रुपये बेालते है न?आज एक एक पाई चुका देता हूं। देखो ठीक से हिसाब साफ करना ।’’
फिर अंगुलियों पर जोड़ बाकी करते हुए बोला
‘‘सौ का भाई साठ
आधे गये भाग
दस दूंगा दस दिलाउंगा
और दस का क्या लेना देना
बोलो हिसाब साफ हुआ कि नहीं ?चलो अब बच्चों का मुंह मीठा कराअेा बहुत दिनो बाद वसूली हुई है।’’
यह सुन कर बनिये से भी हंसे बिना नहीं रहा गया। जाट का एक छोरा पास हीे खड़ा था। बोला ‘‘क्यों काका आज सेठजी बहुत खुुुुुुुुश दिख रहे है।’’ जाट ने कहा ‘‘आज खुश नही होगें तो कब होगें पूरे सौ रुपयोें का हिसाब साफ किया है। अब भी तेरा मुंह मीठा नहीं कराये तेा इन की मरजी।’’
-------श्री विजयदान देथा के संकलन ‘चैधराइन की चतुराइ’ से।
सोमवार, 29 जून 2009

मुस्कान
-सारी दुनिया एक ही भाषा में मुस्कुराती है।
-ऐसा कोई चेहरा नही जो मुस्कुराने पर खूबसूरत नहीं दिखता।
-मुस्कान आपके चेहरे के झरोखे की तरह होती है जो कहती है कि आप घर पर है।
-किसी अजनबी को अपनी एक मुस्कान दीजिये। हो सकता है कि दिन भर में उसे मिलने वाला यह एकमात्र उजाला हेा।

??????????????
उत्तर ही हुये जब
प्रश्न से गुत्थम गुत्था क्या खोजें?
चांदनी ही झुलसाये
कंांेपल को
तब क्या प्रखर धूप को इल्जाम दें ?
सुबह उदास सी जगे
थकी सांझ को क्या बजें?
रिश्तों की चुभन ही क्या कम थी?
जो अब गीत भी चुभें
दूरी ही आततायी बनी
और कहते हो न आयंे तो?
जीवन के झंझावत क्या कम थे
मौसम के थपेड़े आ आ टकराये
मन के दावानल में झुलसा तन
क्या गुहार लगाये,
भीतर का प्रश्न ही दुबक गया तो
उत्तर किसको गले लगाये?
बिन भाव के
उत्तर कब तक लंगड़ाये?
बिचैलिया आ आ गांठ लगाये
प्रश्न हुये अनुत्तरित से
मौन ने साधा अगणित रोष
भटके भाव
ढूंढ लिये
तमाम रस
शब्द शब्द
कोश कोश
अब गूंगी भाषा क्या कहे?
---किरण राजपुरोहित नितिला
रविवार, 28 जून 2009

हर स्त्री की उम्मीद
तब तक
यह समय नही रहेगा
समय बदल जायेगा
हमेशा ऐसे ही थोड़ी रहेगा !!
तब बेटियों की कद्र होगी
रिवाज बदल जायेगें
रीतियां बदल जायेगी
कुरीतियां तो
समूल नष्ट हो जायेगी
बहुत अधिक सम्मान
दिया जायेगा
बेटे बेटियों में
तनिक न फर्क रहेगा
जन्मते ही बिटिया को
खौलते कड़ाह में या
अफीम न सुंघाया जायेगा,
भैंाडापन छिछोरापन की तो
बू न रहेगी
समाज में हर लड़की
गाजे बाजे से ब्याहेगी
उसे सांझ ढले
पाउडर क्रीम थोपकर
चैखट पर खड़े हेाकर
किसी पुरुष को इशारे से
भीतर न बुलाना पड़ेगा,
तब पिता भाइ,
बहन बेटी को बेफिक्र होकर
काॅलेज भेज सकेगें
भीड़ में
यहां वहां हाथ न धरे जायेगें
बेटियंा बोझ न होंगी
जवान होती बेटी के पिता को
जूतियां न घिसनी पड़ेगी।
पूरा घूंघट निकाले
घर का काम निबटा
ड्योढी में बैठी चरखा कातती
औरतें उसांस लेकर
धीमे धीमे बतियाती रहती थी
भरी दुपहरी,
तालाब के तीर दम भर विश्राम करती
बतियाती रहती थी,
हमेशा ऐसे ही नही रहेगा
हम जैसी तकलीफें
हमारी लड़कियों को नही उठानी पडे़गी
तब लड़कियां हंसते हंसते ससुराल जायेगी
दहेज के ताने नही सुनने पड़ेगें
वह युग तो कुछ और ही होगा ,
ऐसा ही है?????
-किरण राजपुरोहित नितिला
बुधवार, 10 जून 2009

छू कर मेरे मन को
-संभावनाओं को अच्छाई में बदलने के लिये हमेशा जोखिम उठाना पड़ता है।
-कोई व्यक्ति जिस हद तक जोखिम से बचना चाहता है उसी हद तक वह डरा होता है।
-असफलता की आशंका के चलते काम टालने से डर और ताकतवर बनता है।
मंगलवार, 9 जून 2009
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बेटे की दावत है ..............
एक कोने में
खड़ा हूं
मैं
लिपे पुते चेहरों को
पर्दे के कोने से देख रहा हूं
मैं
मेहमानों की भीड़ से दूर
बेजरुरत का सामान हूं
मैं
बेटे को दुनिया में लाया
लेकिन आज
परिचय की चीज
नहीं हूं
मैं
पोपले मुंह का लड़खड़ता बूढ़ा
देास्तांे में उसके
शरम की चीज हूं
मैं ,
रह रह याद आती है
मां की पनीली आंखें !!
छोड़ आया था
एक आशा देकर
शहर की अंधी दौड़ में,
सुनकर न सुना
उन्हीं आहों की सजा पाता हूं
मैं!!!!
किरण राजपुरोहित नितिला
रविवार, 7 जून 2009
शनिवार, 6 जून 2009
जरुरी है़..................
भाई बहन प्रेमी युगल
हर रिश्ते में
विश्वास जरुरी है !
दर्द हो भले ही पराया या अपना
अंर्तमन में एहसास जरुरी है !
जीतने वाले हर गर्वित सीने को
एक पीड़ा हार की जरुरी है!
दुख से बुत बनी अंाखों का
करुण विलाप जरुरी है !
खिलखिलाते बच्चे की आंखों में
स्नेह का आह्लाद जरुरी है!
गीत से पहले राग का
आलाप जरुरी है !
तरुणों के उग्र कदमों में
एक ठहराव जरुरी है!
बीते जीवन के हर रंग की
मन में याद जरुरी है!
छोटी सी भूल हो लेकिन
उसका पश्चाताप जरुरी है!
भविष्य के पथ पर
दौड़ते हो सधे कदम
दौड़ते हो सधे कदम
किन्तु भूत पर प्रकाश जरुरी है!!!
-किरण राजपुरोहित नितिला
शुक्रवार, 5 जून 2009

छू कर मेरे मन को
- भलाइयों में जितना द्वेष होता है बुराइयों में उतना ही प्रेम। विद्वान, विद्वान को देखकर ,कवि कवि को देखकर जलता हेै।पर जुआरी जुआरी को ,चोर चोर को देखकर ,शराबी शराबी को देखकर सहानुभूति दिखाता है। चोर, चोर पर आई आफत को देखकर मदद करता है पर विद्वान लोग दूसरे विद्वान को गिरा देखकर खुश होते है। बुराई से सब घृणा करते है इसलिये बुरों में परस्पर प्रेम होता है। भलाई की सारा संसार प्रशंसा करता है इसलिये भलों में विरोध होता है।
-रुई सी मुलायम वस्तु भी दबकर कठोर हो जाती है।
-इष्र्या में अग्नि है परंतु अग्नि का गुण उसमें नहीं।वह मन को फैलाने के बदले और संकीर्ण कर देती है।
-चोरी की कलम में यमराज निपुण है उनकी नजर कीमती चीज पर पड़ती है।
-अनादर नाम की चीज राख की तरह होती है वह शायद भीतर ही भीतर आग को बनाये रहती है लेकिन उपर सेउसके ताप को प्रकट नहीं होने देती।
-बुराई की जड़ जमने के लिये इतना ही काफी है कि अच्छे लोग कुछ ना करे।
गुरुवार, 4 जून 2009

दोस्त................ तुम
दोस्त दोस्त न रहे
तो क्या
उसे दुश्मन मान लें,
ठंडी ठंडी दोस्ती निभाते हुये
क्या बरस गुजार लें
उज्र है तुम्हारी कई बातों से
तो क्या उलाहना दे दूं!!
छोटी सी
महज एक बात के लिए
दोस्त खो दूं,
साथ साथ है
लेकिन
मन से मन दूर बहुत है
तुम मानो,
मैं न मानूं कि
दोस्त दुनिया में बहुत है,
ढूंढ कर देख लो
अगर मुझ सा एक भी पाओ
याद अगर कभी न आये मेरी
बेशक मुझे भूल जाओ ,
साथ थे हर काम में
एक अहम से दूर बैठे हो
मैं तो भूल चुका
लेकिन तुम तन के बैठे हो
यही करना था तो सुनो!
एक बात मेरी सुनना
म्ुुझे तो ठीक है
पर औरों पर रहम करना!!!!
किरण राजपुरोहित नितिला

बात सुनो..................!!
तुम कहते हो
इस दिल की बात सुनो
दिल कहता है
होश का खयाल रखो!
तुम कहते हो
इन आंखांे में
अपने गम भूल जाउं
बूढी आंखेां के पानी को
कैसे भूल जाउं?
तुम्हारे केशों में
अपना आसमां तलाशूं
या
राशन की कतारों का
हैासला रखूं
तुुम्हें हम सफर बनाकर
सपनों में खो जाउं
या
भाई की तालीम
और बहन का घर बसाउं
तुम्हारे कांधे पर
सिर रख कर
दुनिया जहां को भुलाउं
या
इस जहां के कारवां में
अपनी जगह बनाउं
जिंदगी का एक दिन भी
नहीं कटता
चाह कर भी जिंदगी को
भुलाकर
मुहब्बत नहीं कर सकता!!
मेरे हाथ के
फूलों को ही नहीं
खरोचों को भी
थामना होगा
जिंदगी में ही नहीं
सपनों में
भी हकीकत से
सामना हेागा !!!!!
किरण राजपुरोहित नितिला
सोमवार, 1 जून 2009

छू कर मेरे मन को
-वह व्यक्ति जिसने कष्ट नहीं भोगा,अपनी शक्तियों से अपरिचित रहता है।
-सुख-दुख और जीवन -मृत्यु बिना मांगे अपने आप मिल जाते है।
-दिन में सपने देखने वाले ऐसी बातें भी जान जाते है जिनकी तरफ रात में सपने देखने वालों का ध्यान नहीं जाता है।
-जब आदमी रोता है,तब सबसे सच्चा होता है,उजला होता है। रोना कायरता की नहीं खुद का सामना करने की ताकत की निशानी है।

वे़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़ा.................
उदास चेहरा
वो दबी सफेद साड़ी में
गीली आंखें
आसमां देखती खिड़की से,
वर्ष घिसटती
काले सीले कमरे में,
रंगों से बहुत दूर
पटकी गई कोने में,
बांधी गई
रिवाज मजबूरी के खूंटे से
वो चहकती चिड़िया
बैठी थी
बाबुल के मुंडेर पर,
सफेद रंग छूटे
सतरंगे सपने जागे
देखे नीला आसमां
आस भरी आंखें
उसके आंगन
हवा झूमेगी खुशी से
तब ये आंखें
छलकेंगी खुशी से!!!!!!!!
-किरण राजपुरोहित नितिला

ऐ खुदा
खुदा यूं आलम कर जहां में
नेकनीयती भर फिजां में
बिखरा खुशियों की फुहार
म्ुाझसे कर इतना करार
हर घर दाल रोटी की दावत हो
दिल में ईमान शराफत हो
फिर कर सुकूं की बौछार
मुझसे कर इतना करार
हिना से महके गोरे हाथ
दुलहन बेटी देखे हर बाप
बहू पर न हो कोई अंगार
मुझसे कर इतना करार
एक दूजे के गम में शरीफ
ब्ूाढे केा बेटा चैक को नीम नसीब
हर तरफ हो सुहाना आबशार
म्ुाझसे कर इतना करार
--किरण राजपुरोहित नितिला
गुरुवार, 28 मई 2009


छू कर मेरे मन को
-भीड़ के अनेक सिर होते हैं लेकिन दिमाग किसी में नहीं।
-डर के पांव पीछे होते हैं। तन कर खड़े होने पर वही पीछे भाग जाता है।
-आंखें सबकी एक सी नहीं होती क्योंकि आंखों से देखने का विचार सबका अलग-अलग होता है।
-मित्र बनते बिगड़ते रहते है परन्तु शत्रु जस के तस रहते है।
-मनुष्य की रुचि उसके चरित्र का प्रस्तावना होती है।
-कठोरता कमजोर व्यक्ति की झूठी ताकत होती है।
-हम उपदेश सुनते है मन भर, देते है तन भर और ग्रहण करते है कण भर।


वेा अब कहां........???
भागता ही जा रहा है
अंधा जमाना
जाना कहां लेकिन
पहुंचेगा कहां ?
मसरुफियत में है हर शख्स
नहीं पता अब
वो अपना कहां ?
दूर दूर हो रही है
दूरियां सभी
अब वो मीठी सी
नजदीकियां कहां ,
धुंए का गुबार
भरा है पिंजर में
शेार में हम न जाने
गुम हुए कहां,
दब कर उदास है
वो सुहाने बचपन
कागज कि तैरती
वो नइया कहां ,
नही रोता मन अब
गैर की तकलीफ से
आंखों का वो पानी
वो हिचकियां कहां ,
रिश्तों पर खुदगर्जी
का नशा है
देवर भाभी की वो
ठिठोलियां कहां ,
तेलों के रंग हुए
दीप बिजली के
मौली होली वो
दीपावलियां कहां??????
..........................किरण राजपुरोहित नितिला
शुक्रवार, 22 मई 2009
देख तेरे आंगन आई नन्ही परी
हर तरफ से देखो
वह पे्रम से भरी,
सुनकर उसकी कोयल सी आवाज
चला आये तू उस आगाज़
जहां वह खेल रही
देख तेरे अँागन आई नन्ही परी,
वह ले जाती तुझे
किसी और लोक में
जब होती वह
तेरी कोख में
तेज आवाज सुन
वह दुनिया से डरी
देख तेरे आँगन
आई नन्ही परी,
रौनक वह आँचल
में लेकर आई,
पास है उसके
चंचलता की झांई
जिसके छूकर
तू हो गई हरी
देख तेरे आँगन
आई नन्ही परी ..... रुचि राजपुरोहित ’तितिक्षा
गुरुवार, 21 मई 2009

सरवंट (लघु कथा)
स्कूल से आते ही मोहन को पता चला कि देवजी दाता अपने बेटे के
पास से शहर से लौट आये हैं ,वह उनसे मिलने के लिये उतावला हुआ। उनका
बेटा किशन, मोहन का बचपन का साथी है।
किशन अब दिल्ली में बहुत बड़ा प्रशासकीय अफसर है। काफी सालों बाद किशन
ने अपने पिता को अपने पास बुलाया था। उसके क्या ठाठ-बाट,रौब-दाब है यही
जानने की उत्सुकता उसे झट से देवजी दाता के पास खींच लाई।
प्रणाम कर वह अपने यार और शहर के हाल चाल पूछने लगा । अपेक्षा के
विपरीत दाता कुछ उदास से लगे। बेटे की खुशहाली से फूले नही समाने वाले
बहुत बुझे से लगे। बहुत सी बातों के उन्होंने जवाब दिये फिर एक गहरी दृष्टि
मोहन के चेहरे पर डाल कर बोले
‘‘....अबै थूं मनै ओ बता‘क सरवंट मतलब कांई व्है ?..’’ वह उनकी मनोस्थिति
से घबरा गया। उदास तो वे पहले ही लगे थे। लेकिन ये सवाल उन्हें क्यों पूछना
पड़ गया। अनायास ही वह सही अर्थ छुपा कर बोला
‘‘ इंग्लिस में सरवंट मतलब बापू व्है। पण ..पण..आप ओ क्यूं पूछियो ? कांई कारण है?’’
‘‘....किसनो बेटो आपरै दोस्तां नै म्हारे सांमी इसारो कर’र कयो ऐ सरवंट है।
...उणी बखत म्है सोच लियो हो’क तनै इणरो मतलब जरुर पूछूंला.......पण बेटा थूं ई मनै
टाळ रयो है...... अगर ओ ई मतलब व्है तो दोस्त रै बापू नै दोस्त परणाम तो करता.
ई व्हैला पढ़िया लिखियंा रै समाज में...........पण सरवंट नै.......’’ रुंधे गले से बोले
औैर दूर कहीं देखने लगे ।
किंकत्र्तव्यविमूढ़ सा मोहन दाता से नजरें न मिला सका । उसकी आंखों में
अतीत के कई दृश्य नाच उठे। रात -दिन दिहाड़ी-मजदूरी में खटते दाता की आंखों
में एक ही सपना था कि किशन योग्य बन जाये और सब सुख से रहें । आधा
पेट रहकर भी बिना थके किशन को पढ़ाया। वो आज कितने टूट गये।
वह निःशब्द उठ गया। .....किरण राजपुरोहित नितिला

ओ! चिरैया
ओ आंगन की गोरैया ओ!
सुन मेरी चिरैया ओ
चहकती है तू अलसवेरे
जलते हैं दीप बहुतेरे
यहंा से वहां
गोद की जमीं से
हदय के आसमां तक
इधर उधर
तुम चंचल लहर
मस्त स्वछंद
घर में गूंजता छंद
अल्हड़ हिरनी सी
उमंगें कुलाचती सी
अठखेलियों से दिप दिप
ये मेरा मन आंगन
पर जानती हूं मैं
उड़ जाओगी इक दिन
अन्य आकाश में
आशीष विश्वास की पाखें ले
नया आसमां तलाशने
अल्हड कदम
डग बन जायेगें
दृढ़ता के
चहकेगा इक नया आयाम
आत्मश्विासी लहर बन
बना जाओगी नई सीमायें
कुलांचों से शिखर छू लोगी तुम!
किरण राजपुरोहित नितिला
ये क्या हो गया है?
अजान आरती एक सुर मेंहो
वेा दिन लद गये हैं
पहले बात और थी
हथियार अब नंगे हो गये हैं,
मां की सेवें अम्मां की सिवइयां
इक आंगन सूखी थी
गरम हुये खून
पे्रम प्यार ठंडे हो गये हेेैं,
चुन्नी बुर्का ओढ़ने
झूले साथ सावन में
लाल पीले भूरे
सब बदरंगे हो गये हैं,
राख हुई किलकारियां
चूड़ी पायल
हंसते घर वीरान
सूने खंभे हो गये हैं,
युगों का प्रेम भूल
अंगार सीने में लिये है
राह में गाय मरी
बस दंगे हो गये है

काश वो होते!
फिर जाना चाहा उस पार
देखा पुल ही टूट गया
बात तो कुछ नहीं थी
फिर भी शायद कुछ थी
अपेक्षाओं की गठरी के टुकड़े छिटके पड़े थे
यादों की किरचें बुहारी ही थी कि
स्मृतियों के रंगमंच से ओझल होने की मांग की ,
उसने समझा अब तक यूं ही लादे थे
न पूछा न समझा
घोंघे की तरह उस ओर ही दुबक गया
पुकार टकरा टकरा कर लौट आई,
भरी दुपहरी साथ छोड़ गये
अब ही तो लगने लगे थे
अपने से और हो गये सपने से
चिलचिलाती धूप में काश वो अब भी होते!!!
अपने से ,
कौन सुनेगा?
अपनी अपनी सोचों के गढ़ में घिरे हैं कोहरे से
खिड़की है न द्वार
चाहूं तो भी कौन करे विचार ?
यादों के पट को कितना खड़काउं
जब तीर लिये हैं तैयार ........किरण राजपुरोहित नितिला
मंगलवार, 5 मई 2009

निश्चय(कविता)
मेरे भीतर जब प्राण प्रक्रिया
प्रारंभ हुई तब
माँ की कोख में
विगत में भी हलचल हुई होगी,
मेरे भीतर के जीवांश् ने
रातों मँा को फिर जगाया होगा,
रह रह याद आये होगें
वो शब्द जो कुटुम्ब की
ओेरतें कह गई
जो आत्मीय जन ने कहे
जो गरम शीशे की मानिंद
कानों से हृदय को बेध गये;
नवजात क््रकंदन ने जब
उत्सुकता जगाई थी,
बूढ़ी दाई ने आंँचल हटा कुछ देखा और
मायूस सी मंत्रणा करने लगी गृहस्वामियों से,
भय व्याप्त हवा में सद्यः प्रसूता ने डूबते हृदय से
पहली और आखिरी बार सीने में भींचा था
नौ महीने सींचा वह प्राण पिंड
जो निर्दयता से झपटा जा चुका था,
निरीह,निस्तेज,बौराई मां
निर्जीव भांति विस्फारित आंखें पड़ी थी;
ठान चुकी थी किंतु इस बार
कर निश्चय अपार;
एक बार फिर ममत्व घोंटने की तैयारी थी
किंतु रौद्र दृश्टि से कंपा दिया था
नव प्रसूता वह चंडी सी,
हिला गई उस ्रकू्रर परंपरा को
सामंती खोखली जड़ों को
जिसने दंभ की खातिर
पीढ़ी की सीढ़ी को,
सृश्टि को रौंद डाला था,
आवरण बन छुपा लिया था
सृश्टि को
मनुष्यत्व को
एक वंश को
फौलादी फैसलों की खोह में,निस्तेज ,भयक्रांत खड़ा तक रहा था आडंबरी पुरूश वर्ग ----किरण राजपुरोहित‘नितिला’
सोमवार, 4 मई 2009

ओस की बँूदें
सुबह टहलते हुये
भिगो देती है
मन अंतर्मन
नन्ही घास पर ओस की बूँदें ,
महसूसता हूं
भीतर तक आर्द्रता
सेाख लेता है तनिक तृषित मन
चू पड़ी हो जैसे
बालू पर बँूदें,
जल्दी से आगे बढ़ जाता हँू किंतु
हथेली पर लिये खड़ी पाता हँू
प्त्तियों को ओस की बँूदें
भर लो!आखेां में
समा लो! हृदय में
जरूरत है, जरूरत पड़ेगी
जब बाजार में हुये विस्फोट से
आहत लोगों के क्रंदन सुन कर भी
झुका सिर,अनदेखा कर
गुजरने लगोगे!
....................किरण राजपुरोहित नितिला

फिर भी उसका धर्म
वह
कइ्र्र दिन बाद
आज फिर हुमकती आई वह
पल्लू को मुंह में दबाकर
शर्माते हुये दरवाजे की ओट में हो गई
मैं समझ गई,
फिर उदास सी काम में जुट गई
झुकी हुई पीठ पर नजर आये
ताजे उभरे निशान
फुर्ती से ढक गई
मैं समझ गई ,
नजरें झुकाकर फिर जमीन कुरेदने लगी
उसकी ये नजरें ये कलाप
जाने पहचाने है मेरे
उसने कुछ कहा नही
पर मैं समझ गई ,
गहरे रंग के सिंदूर तले
फिर आकार ले रही थी
उसके भगोड़े पति की आठवी संतान और
पीठ पर झांकती उसके चरित्र की सुनवाई
मैं समझ गई
भाग जाना सारे पैसे लेकर एक बार फिर ,
मैंने पूछना चाहा............???
वह समझ गई
ठंडी उसांस भर बोली
‘’ कैडो़‘ ई व्है तो म्हारों सुहाग है
जीवण रो आधार
म्हारे टांबरां रो बाप है
सतियां रो धरम ई ओइ‘ ज है ’’
म्ंौं पूछती हूं तुम दोनों के धरम इतने विपरीत क्यों हैे?
...........किरण राजपुरोहित नितिला
घटनाओं का दवंद
होता है मानस में
विचारों का मंथ्न
झकझोर देता है
अनेक सिरेे दृश्टिगोचर होते है
एक सिरे को थाम
लेखनी भाव हदय मानस विचार संवेदना के गहरे शब्दों की माला
पिरोती चली जाती है
गहनतम प्रेरणा से
लता की तरह
शब्दों से लिपटती एकमेक होती
नवजातकचनार सी
बढती ही जाती हे ,
सोच विचार दृष्टिकोण के
फूल खिलाती
तृप्ति का गंधपान कराती
मन मस्तिश्क को शीतल करती
मानस के बहुत मंथन से
जन्म होता है
कविता का जो
पाठक को एक विचार में
मथता छोड़ देती है््््््
कांच का टुकडा़ टूट कर तेज धार वाला छुरा हो जाता है वही कैफियत इंसान के दिलक की है।
प्रतिभा बिना विघा,कंजूस का ध न अैर मुर्ख का बल किसी काम नहीं आता।
कायर बहुसंख्यक होना चाहता है जबकि बहादुर अकेले लड़ने में शान समझता है ।
दुनिया में जो बदलाव हम चाहते है ंवैसा बदलाव हमें पहले खुद में लाना हेागा।
पुरुष बढती उम्र महसूस करता है और स़्त्री के चेहरे पर बढती उम्र दिखाई देती है।
मंगलवार, 28 अप्रैल 2009


खिताब कविता
वह लौट आई है आज
फिर इसी पिंजरे में
जहां कुछ वर्श पूर्व फेंक दी गई थी,
कन्यादान करके सौभाग्य पाये थे वे
भार भी हलका हुआ था काफी
उसे उसके ‘अपने घर’ भेजकर;
इससे पहले उसकेा खूब पिलाये गये
संस्कारों के घूंट
उस ‘अपने घर’ के लिये
जैसे चिड़ियाघर भेजने से पहले
जानवर को वहां के अनुरुप ढाला जाता है ;
क्या पहनना चाहिये
कहां जाना चाहिये
किससे बात करनी चाहिये
नजरें नीची रखनी चाहिये
कम और धीरे बोलना चाहिये
सवाल नहीं पूछना चाहिये
आज्ञा माननी चाहिये
सवालिया चेहरा ही लिये रही,
वह पूछना चाहती रही
क्या उसे जीवित रहना चाहिये ?
पर पूछ न पाई
वर्जित है खुद की सोच रखना
लेकिन जवाब हाँ था
हाँ पति परमेष्वर की चाकरी नामक पुण्य के लिये;
उसका मरना अनगिनत सवाल खड़े कर देता है
दोनों वंषों के लिये
उसकी नींव पर ही तो खड़ा होगा
नया वंष
और कंगूरे हंसते रहेगें उसकी बलि पर;
अच्छी गऊ बिटिया का खिताब पाये
वह ‘अपने घर’ के खूंटे से बांध दी गई
और मजबूरी -रिवाजों की कुंडी लगा दी गई्र
फिर खटने लगी वह
अच्छी बहू के खिताब के लिये ,
खुद के लिये सोचना उसका
उन लोगों को पसंद नही है
और पसंद नहीं है
बजती पायल पहनना
फबते कपड़े पहनना
पढना
लिखना
खिलखिलाना
खुल कर सांस लेना आसमां देखना ;
उनकी पसंद का खयाल रखना
यही उसका परम धर्म है
पसंद है केवल उन्हें
उसके धोये प्रेस किये कपड़े
उसका बनाया खाना
चमचमाता घर
नीची नजरें
कम जरुरतंे,
सब कहते हैं
अच्छी बहू पाई है आपने
कितना अच्छा काम करती है !!!!
अपनी मिट्टी की एक कतरा
हवा भी पाती है
कुछ वर्शों में
अनेक षर्तों पर
पिता का निरीह चेहरा देखकर
वो भी नहीं चाहती अब तो
उसके जर्जर हुये षरीर को देखकर
मां की वह घुटी घुटी रुलाई सह नहीं पाती
लौट जाती है वहीं
‘खुष हूं’ का आष्वासन देकर
उसी पिंजरे में
ताउम्र खटने के लिये
बदले में पाती है
‘अपने घर ’में
दो जून रोही व
अच्छी पत्नि का खिताब ?
.........किरण राजपुरोहित नितिला








