.....ऐसा लगता है
आजकल
कुछ कमी सी लगती है
इन कानों केा
इन नथुनों को
लगता है जैसे
कुछ लगातार
घट रहा है,
धरा को श्राप है
जेा कम होना चाहिये
वह बढ रहा है---
खून खराबा प्रदूशण जहर द्वेश ,
जेा बढना चाहिये
वह घट रहा है
प्रेम षांति विष्वास
....किरण राजपुरोहित नितिला
शुक्रवार, 4 सितंबर 2009
बुधवार, 2 सितंबर 2009
शनिवार, 29 अगस्त 2009
मेरी कविता
वो ------------
वेा मेरे अंतस में छुपा रहा
मैं दर दर सिर पटकता रहा
सारी उमर यूं मासूम बना
वो मुझे रोज ही ठगता रहा
देखा जब भी प्यार से उधर
अजनबी सा ही तकता रहा
बांटना चाहा दर्द उसके
क्यूं मेरे हाथ झटकता रहा
म्ेारी सूरत ही है ऐसी
जिंदगी भर ये समझता रहा
देखा सदा मतलब से अपना
मैं बस यही षुक्र मनाता रहा
साथ मेरे वो मेरा साथी
इन खयालों में भटकता रहा
-किरण राजपुरोहित नितिला
वेा मेरे अंतस में छुपा रहा
मैं दर दर सिर पटकता रहा
सारी उमर यूं मासूम बना
वो मुझे रोज ही ठगता रहा
देखा जब भी प्यार से उधर
अजनबी सा ही तकता रहा
बांटना चाहा दर्द उसके
क्यूं मेरे हाथ झटकता रहा
म्ेारी सूरत ही है ऐसी
जिंदगी भर ये समझता रहा
देखा सदा मतलब से अपना
मैं बस यही षुक्र मनाता रहा
साथ मेरे वो मेरा साथी
इन खयालों में भटकता रहा
-किरण राजपुरोहित नितिला
बुधवार, 26 अगस्त 2009
मेरी किवता
विष्वास ये गूंजते रहे
मुड़े हैं जिंदगियों के पन्ने
वक्त उन्हें उधेड़ता बुनता रहा
दंगाइयों के कहकहे सुन कर
जमीं का बदन हरहराता रहा
क्यूं है क्या है कौन है??
प्रष्न सदैव पूछते रहे
थका सा सूरज उगा लज्जित सा
और दोपहर तिलमिलाती है
आस्था के आंगन में
तुच्छ रोषनी झिलमिलाती है
यादों के पिछवाड़े में सदा
मोरमन मौन कूकते रहे
किलकारी ही कत्ल न हो
मां हर पल मन्नत यही मांगती
जवानियों के ज्वार न भटके
आषीशें हर रात जागती
बदलेगा इंसान यद
िविष्वास ये गूंजते रहे!!! ----किरण राजपुरोहित नितिला
मुड़े हैं जिंदगियों के पन्ने
वक्त उन्हें उधेड़ता बुनता रहा
दंगाइयों के कहकहे सुन कर
जमीं का बदन हरहराता रहा
क्यूं है क्या है कौन है??
प्रष्न सदैव पूछते रहे
थका सा सूरज उगा लज्जित सा
और दोपहर तिलमिलाती है
आस्था के आंगन में
तुच्छ रोषनी झिलमिलाती है
यादों के पिछवाड़े में सदा
मोरमन मौन कूकते रहे
किलकारी ही कत्ल न हो
मां हर पल मन्नत यही मांगती
जवानियों के ज्वार न भटके
आषीशें हर रात जागती
बदलेगा इंसान यद
िविष्वास ये गूंजते रहे!!! ----किरण राजपुरोहित नितिला
सोमवार, 24 अगस्त 2009
शनिवार, 22 अगस्त 2009
बिटिया.............
प्ंखों को जरा लरज़ा बिटिया
बाहर नीला आसमां बिटिया
मेरेे अरमान तेरे दिल में
अब खुली हवा दिखा बिटिया
मौसम अड़चनें देता रहेगा
मुष्किलें से न घबरा बिटिया
आंचल भर भर आषा और आषीश है
करेगा तेरी रक्षा बिटिया
अहंकार उसमें हो कितना ही
तेरे दम से दुनिया बिटिया
देख अपनी जड़ें खोद कर वो
इतरा रहा है कितना बिटिया
बैठा घात लगाए सदियों से
पर तू भी है सबला बिटिया
-किरण राजपुरोहित नितिला
प्ंखों को जरा लरज़ा बिटिया
बाहर नीला आसमां बिटिया
मेरेे अरमान तेरे दिल में
अब खुली हवा दिखा बिटिया
मौसम अड़चनें देता रहेगा
मुष्किलें से न घबरा बिटिया
आंचल भर भर आषा और आषीश है
करेगा तेरी रक्षा बिटिया
अहंकार उसमें हो कितना ही
तेरे दम से दुनिया बिटिया
देख अपनी जड़ें खोद कर वो
इतरा रहा है कितना बिटिया
बैठा घात लगाए सदियों से
पर तू भी है सबला बिटिया
-किरण राजपुरोहित नितिला
गुरुवार, 20 अगस्त 2009

छू कर मेरे मन को
-हमेषा सच बोलोगे तो ध्यान नही रखना पड़ेगा कि कल क्या बोला था।
-एक सच्चा हदय सारे संसार को विलक्षण षक्तियों से अधिक मूल्यवान है।
-जिस तरह आग से आग नहीं बुझती उसी तरह पाप से पाप खत्म नही होता ।
-बुद्धि के लिये अध्ययन इतना ही आवष्यक है जितना षरीर के लिये व्यायाम।
-कुछ लोग अच्छे अवसर खोर ही महान्बनते है।
बुधवार, 19 अगस्त 2009

मैं छाया हूं!!!
हर एक का रोषनी में साया हूं
सुख में मुझे देखते नही
चेहरा उपर किये
अनदेखी किये जाते है,
पीछा करती हूं फिर भी
रौंदना चाहते है पैरों से
सरकती जाती हूं मैं
साथ सब छोड़ देते है
रहती हूं तब भी मैं
भंगुर से मोह बंधाते हैं
लेकिन चिता मंे भी साथ देती हूं मैं
अंधेरे में न दिखूं
हूं तब भी मैं
अमीर गरीब बूढा जवान
भेद नही तनिक करती मैं
सबका साथ निभाती जाती मैं
सूर्य की सहचरी हूं मैं
सृश्टि के पहले कण से
अस्तित्व में हूं मैं
हर वस्तु
हर अकार प्रकार
हर प्राणी का अभिन्न हूं मैं
सुख दुख में भी समान प्रेम है
प्राणी से,
लेना कुछ नही है मुझे
इस तुच्छ प्राणी से
निस्वार्थिनी हूं मैं !1
सहभागिनी हूं मैं!!
-किरण राजपुरोहित नितिला
रविवार, 2 अगस्त 2009

म्ेहनत का सार लघु कथा
एक बार महादेव को दुनिया पर बहुत क्रोध आया। षंख नही बजायेेगंे। महादेव षंख बजायें तो बरसात हो। अकाल पर अकाल पड़ा। पानी की एक बूंद भी नहीं बरसी। दुनिया बहुत कलपी बहुत पा्रयष्चित किया पर महादेव टस से मस नही हुए।
एक बार महादेव और पार्वती आकाष मार्ग से कहीं जा रहे थे। क्या देखते हैं ऐसे भयंकर सूखें में भ्ी एक जाट खेत जोत रहा है । एडी से चोटी तक पसीने सराबोर। भोले बाबा के अचरज का पार नही। बरसात हुए तो जमाना हुआ । फिर यह खेत में क्या कर रहा है? इसका दिमाग तो नही चल गया?
विमान से उतर कर चैधरी के पास गये। पूछा ‘‘ पगले क्यों बेकार मेहनत कर रहा है? सूखी धरती में पसीना बहाने से क्या लाभ! पानी का तो सपना भी दुर्लभ है ’’
चैधरी बोला ‘‘ ठीक कहत हो,पर जोतना भूल न जाउं इस लिए हर साल खेत जोतता हूं। जोतन भूल गया तो पानी बरसा न बरसा बराबर।’’
बात महादेव को भी जंची पर सोचा अरसा हुआ मैंने भी षंख नही बजाया। कहीं बजाना भूल तो नहीं गया?’’
वहीं खड़े खड़े षंख जोर से बजाया और चैफेर घटाएं घुमड़ी । बेहिसाब पानी बरसा।
आभार श्री विजयदान देथा

नियति..........
एक दिन
नियति
अपने नियत काम
छोड़ कर
कुछ बुनने बैठ गई
मखमली सुनहरी डोरी से
मेरा भाग्य लिख
सतरंगे तारें सी चुन्नटें डाल
रेष्मी धागे
से सहला दिया
मेरी छोटी सी मुलायम जिंदगी बुनी
गुलाबी दिन बुने
और
भीनी ख्ुष्बू की फुहार दे
दो घड़ी ठिठक निहरने लगी
सोच तनिक!
छत के बरामदे में कूंची ले खड़े
रंगों के छींटे से
और मोहक लगते
गोरे चिट्रटे लड़के पर फिरा दिया!
-----------किरण राजपुरोति नितिला
शनिवार, 1 अगस्त 2009

स्मृतियों के चलचित्र
स्मृतियों
का किवाड़
थपथपाता है
कभी कभी ये मन
फुर्सत में
अतीत को जीवंत करने
बैठ जाता है ये मन,
ये गहरा मन
दुहराता है
स्मृतियों के
चलचित्र
मानस पट पर उभरते है
वे चेहरे जो
आपधापी में विस्मृत से हेा गये
अब जाने क्यूं
याद आकर
भले भले से लगते
अपनापन लिये हुये,
लगता!
इन्हें इस तरह
बीत जाना जान कर
मुठ्रठी में भींच कर
क्यूं न रख लिया,
बचपन का हर पल
याद भले नहीं
लेकिन कई चेहरे
अब याद कर कर के
एक प्रष्न के
सटीक उत्तर की भांति
रटे जा चुके हैं,
जब चाहा
मानस में आकर
बैठ जाते हैं वे
और यादों की
नटखट खिड़कियां
खुल खुल जाती है
वर्षों पुरानी
सुगंधित हवा
नथुनों में
तैरती सी लगती है
फिर से जानी पहचानी
और पुराने चलचित्र
लड़खड़ा कर संभलने लगते है!!!!!
.........किरण राजपुरोहित नितिला
शनिवार, 18 जुलाई 2009

झिलमिल रात
चंाद ने मुस्करा कर
तारों ने झिलमिला कर
खिलखिलाकर
रात का स्वागत किया
चांद तारे अैार रात
मिल कर गुनगुनाने लगे
चांदनी की लय पर
धरती झूमने लगी
रात रानी महकने लगी
नन्हे तारों से
झिलमिल हुई धरती
जुगनु से चमकती
दमकती चूनर ओढ़
यामिनी चली
ठुनक ठुनक
हौले हौले
गगन ने गवाक्ष से
झुक झुक चुपके से झांका
तेा रोका !
घड़ी पलक ठहर जाओ
घन का घनन घनन
गान सुनती जाओ!
-किरण राजपुरोहित नितिला
बुधवार, 15 जुलाई 2009

तुमको मैंने!!!!़़़़़़़़़़़़़़़़़............
दुनिया की भीड़ में
जब भी अकेली हुई मैं
साथी बना पाया तुमको,
अंधेरी रात में एकाकी हुई
चांद बने पाया तुमको,
चिलचिलाती धूप ने झुलसाया
छांव बने पाया तुमको !!!
सावन की तपन ने घेरा
रिमझिम बरसे पाया तुमको !
गीत लिखा जब भी कोई
कलम ने हर बार गाया तुमको
सितार हुआ मिजराब से झंकृत
हर सुर में पाया तुमको
बंद बांखों की खिड़की से झांका
अपने ही भीतर पाया तुमको!!!!!!!!!!!
...........ििकरण राजपुरोिहत ििनितला
रविवार, 12 जुलाई 2009
शुक्रवार, 10 जुलाई 2009
किवता
प्रियतम तुम......................
जबसे हुये हो
तुम
दृष्टि से ओझल
इन नैनों में बस गये हो,
पलकों केा क्यूं झपकाउं मैं
स्वपन में भी बसे हो
तुम
हाथ छुड़ा कर गये जिस पल
और गहरे उतर गये हो
तुम
हलचल सी हेाती है
तन मन में
अपने खयालों में मुझे
जब
छूते हो हौले से,
मुझे न सही
मेरी तस्वीर ही देख लो
ये सूजी आंखें
पुकारेंगी तुम्ही को
रोम रोम की यही पुकार है
एक बार आ जाओ तुम
चांदनी में चांद को
मैं देखूंगी
उसी पल
देखना तुम
मेरी व्यथा वही कहेगा तुमसे
समझना तुम
और कुछ कहना तुम..............
किरण राजपुरोहित नितिला
मंगलवार, 7 जुलाई 2009
पिताजी अंटी में
लघु कथा
बनिये का बच्चा दस बरस की उम्र के बराबर अकल साथ ले कर जनमता है। बोलना सीखता है तब तक तो अकल उसके पांवों में लोटने लगती है। एक बनिये के एक ऐसा ही होशियार बेटा था। सातवें बरस तो वह बेखटके दुकान का सारा काम करने लगा कम तौलना, कम नापना और झूठ बोलना । पिता को जब पूरा भरोसा हो गया तो वह सारे दिन वसूली करने लगा। दुकान की देहरी पर भी नहीं चढता था। लोगबाग बच्चे को ठगने की सोच कर आते पर ख्ुाद ठग जाते थे। फिर भी मजाल है जो पता चल जाये।
एक दिन एक जाट सौदा सुलुफ के लिए आया। छोरे को अंगुली से दिखा कर बोला
‘‘एक रुपये का मालवी गुड़ तौल दे।’’
जाट ने सोचा मांगेगा तो रुपया दे दूंगा नहीं तो उधार है ही । छोरे ने सोचा सबेरे सबेरे कौन उधार करे ! नकदनारायण का आसामी नहीं देख कर छोरे ने कहा ‘‘पिताजी वसूली पर गये है। सांझ को आयेगें । मुझे भाव मालूम नहीं।’’
छोरे की होशियारी देख कर जाट को गुस्सा आ गया। झट से रुपया निकाल कर कहा
‘‘पिताजी मेरी अंटी में है। यह ले!’’ यह कर उस ने रुपया उस की ओर उछाल दिया। कहा, ‘‘अब फुरती से तौलता हुआ नजर आ!’’
--------- विजयदान देथा
रविवार, 5 जुलाई 2009

छू कर मेरे मन को
-किसी भी व्यक्ति के लिये स्वयं केा खुद की ही बेड़ियों से आजाद कर पाना सबसे कठिन होता है। ऐसा नही होता तो शराब व सिगरेट की कंपनियां कब की बंद हो चुकी होती ।
-हम जब से जन्म लेते है तब से ही मां बाप के जीवन का लक्ष्य बन जाते है। उनके सपनों की सूची में हमारी सफलता सबसे उपर होती है और वे इसके लिये जी जान से मेहनत करते है। हम ये सब इसलिये नही समझ पाते क्यों कि हम इस अनुभव से नही गुजरे होते है।
-हमारे माता पिता की किसी मामले में गलत होने की संभावना हमसे बहुत कम होती है क्योंकि वे दुनिया को हमसे बेहतर तरीके से समझते है।
-जिंदगी की रफतार इतनी तेज न होने दें कि किसी की मदद की गुहार भी आप तक न पहंुच सके।
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