गुरुवार, 11 मार्च 2010
छू कर मेरे मन को
.......बहुत सी मुरादें ऐसी होती है जो हमारे अंदर रहती है पर हमें पता नही देती । वे शोर नही करती, बाहर नही दिखती, वे अपने होने का पता नही देती । हम उनके बारे में नही जानते इसलिए उनके पूरी होने की दुआ भी नही करते ।
........लोग जानकारियों का खजाना है ।
........आदमी अपने आप में बहुत से सवालों का जवाब है ।
........अपना महत्तव बनाये रखने के लिये चुप रहना जरुरी होता है ।
........खुद को सन्तुष्ट करना मुश्किल है।
सोमवार, 8 मार्च 2010
यह एक दिन
यह एक दिन
हर वर्ष आता है
या शायद
लाया जाता है
यह दिन ,
आंकड़ों को टटोलते हुये
कभी कहता 1000 पर 945
कभी 33 प्रतिशत
कभी 18 प्रतिशत ,
इनमें हेरफेर से
हो जाता है
क्या समाज में परिवर्तन ?
बदल तो नही जाती
मानसिकता ,
प्रकृति की प्रकृति
और कुछ कुछ नियति,
कम तो नही होती
रोज की घटनायें
प्रताड़ना
गली सड़क पर
उछलते फिकरे
बसों में हाथों की हरकतें
भीड़ में ठेलमठेल
मां से शुरु होकर
बहन तक जाती गालियां
लड़कियों की पाबंदी
बचपन से स्त्री बनने का दबाव
और नुमाइश लड़की की
कुछ लोगों के सामने
जो आखिर पुरुष बन
तय करता है
उसका भविष्य
अपनी शर्तों पर
रिवाजों की दुहाई देकर !
सदियों की मानसिकता ही तो
कायम रखता है ,
कितनी ही उचाईयां छूकर भी
समाज की
प्रश्नवाचक दृष्टि
वक्रता कम नही होती
वह तीक्ष्ण होकर
कसौटियों के कांटे
और बिछाकर कहता
अब!
पार होकर
दिखाओ तो जानें!
..............किरण राजपुरोहित नितिला
हर वर्ष आता है
या शायद
लाया जाता है
यह दिन ,
आंकड़ों को टटोलते हुये
कभी कहता 1000 पर 945
कभी 33 प्रतिशत
कभी 18 प्रतिशत ,
इनमें हेरफेर से
हो जाता है
क्या समाज में परिवर्तन ?
बदल तो नही जाती
मानसिकता ,
प्रकृति की प्रकृति
और कुछ कुछ नियति,
कम तो नही होती
रोज की घटनायें
प्रताड़ना
गली सड़क पर
उछलते फिकरे
बसों में हाथों की हरकतें
भीड़ में ठेलमठेल
मां से शुरु होकर
बहन तक जाती गालियां
लड़कियों की पाबंदी
बचपन से स्त्री बनने का दबाव
और नुमाइश लड़की की
कुछ लोगों के सामने
जो आखिर पुरुष बन
तय करता है
उसका भविष्य
अपनी शर्तों पर
रिवाजों की दुहाई देकर !
सदियों की मानसिकता ही तो
कायम रखता है ,
कितनी ही उचाईयां छूकर भी
समाज की
प्रश्नवाचक दृष्टि
वक्रता कम नही होती
वह तीक्ष्ण होकर
कसौटियों के कांटे
और बिछाकर कहता
अब!
पार होकर
दिखाओ तो जानें!
..............किरण राजपुरोहित नितिला
शनिवार, 6 मार्च 2010
तुम!!!!!!!........
तुम!!!!!!!........
न जाने किस
स्वर लहरी पर
तुम आये और
प्रेम का निमंत्रण बन गये !
मौन अर्थ बने
अर्थ मेरे अभिव्यक्त
अभिव्यक्ति ने परिपूर्ण किया
शब्द को और
शब्द तरंग बने
तरंग प्रेम
और प्रेम जीवन ;
झंकृत किये है
तुमने मेरे हर पल
लेकिन आशंकित हूं ..........
न लौट जाना
हवाओं की तरह
सूरज की तरह
दिन रात की तरह
बस व्याप्त हो जाना
चहुं ओर
जैसे प्रकाश की किरणें
जैसे प्रीत के वचन
और हवा सनसन !
सर्वेश्वर हो जाना
शून्य की तरह और
भर देना
मेरे अंतर्मन के
खालीपन को
कि मैं
आकंठ डूबी रहूं
तुम में
तुम्हारी प्रीत में !
......................................किरण राजपुरोहित नितिला
गुरुवार, 4 मार्च 2010
नन्ही परी
नन्ही परी
देख तेरे आंगन आई नन्ही परी
हर तरफ से देखो
वह प्रेम से भरी,
सुनकर उसकी कोयल सी आवाज
चला आये तू उस आगाज़
जहां वह खेल रही
देख तेरे अँागन आई नन्ही परी,
वह ले जाती तुझे
किसी और लोक में
जब होती वह
तेरी कोख में
तेज आवाज सुन
वह दुनिया से डरी
देख तेरे आँगन
आई नन्ही परी,
रौनक वह आँचल
में लेकर आई,
पास है उसके
चंचलता की झांई
जिसके छूकर
तू हो गई हरी
देख तेरे आँगन
आई नन्ही परी ..... रुचि राजपुरोहित ’तितिक्षा
देख तेरे आंगन आई नन्ही परी
हर तरफ से देखो
वह प्रेम से भरी,
सुनकर उसकी कोयल सी आवाज
चला आये तू उस आगाज़
जहां वह खेल रही
देख तेरे अँागन आई नन्ही परी,
वह ले जाती तुझे
किसी और लोक में
जब होती वह
तेरी कोख में
तेज आवाज सुन
वह दुनिया से डरी
देख तेरे आँगन
आई नन्ही परी,
रौनक वह आँचल
में लेकर आई,
पास है उसके
चंचलता की झांई
जिसके छूकर
तू हो गई हरी
देख तेरे आँगन
आई नन्ही परी ..... रुचि राजपुरोहित ’तितिक्षा
बुधवार, 3 मार्च 2010
वह समय ऐसा होगा?
वह समय ऐसा होगा?
तब तक
यह समय नही रहेगा
समय बदल जायेगा
हमेशा ऐसे ही थोड़ी रहेगा !
तब बेटियों की कद्र होगी !
रिवाज बदल जायेगें !
रीतियां बदल जायेगी !
कुरीतियां तो समूल नष्ट हो जायेगी !
बहुत अधिक सम्मान दिया जायेगा
बेटे बेटियों में तनिक न फर्क रहेगा
जन्मते ही बिटिया को खौलते कड़ाह में या
अफीम न सुंघाया जायेगा
भैंाडापन छिछोरापन की तो बू न रहेगी
हर लड़की गाजे बाजे से ब्याहेगी
उसे सांझ ढले पाउडर क्रीम थोपकर
चौखट पर खड़े हेाकर
किसी पुरुष को इशारे से
भीतर न बुलाना पड़ेगा,
तब पिता भाई
बहन बेटी को बेफिक्र होकर
कॉलेज भेज सकेगें
भीड़ में यहां वहां हाथ न धरे जायेगें
बेटियंा बोझ न होंगी
जवान होती बेटी के पिता को
जूतियां न घिसनी पड़ेगी,
पूरा घूंघट निकाले
घर का काम निबटा
ड्योढी में बैठी चरखा कातती
औरतें उसांस लेकर
धीमे धीमे बतियाती रहती
भरी दुपहरी,
तालाब के तीर
दम भर विश्राम करती
बतियाती
हमेशा ऐसे ही नही रहेगा
हम जैसी तकलीफें
हमारी लड़कियों को नही उठानी पडे़गी
तब लड़कियां हंसते हंसते ससुराल जायेगी
दहेज के ताने नही सुनने पड़ेगें
वह युग तो कुछ और ही होगा ,
क्या ऐसा ही है?????
...............किरण राजपुरोहित नितिला
तब तक
यह समय नही रहेगा
समय बदल जायेगा
हमेशा ऐसे ही थोड़ी रहेगा !
तब बेटियों की कद्र होगी !
रिवाज बदल जायेगें !
रीतियां बदल जायेगी !
कुरीतियां तो समूल नष्ट हो जायेगी !
बहुत अधिक सम्मान दिया जायेगा
बेटे बेटियों में तनिक न फर्क रहेगा
जन्मते ही बिटिया को खौलते कड़ाह में या
अफीम न सुंघाया जायेगा
भैंाडापन छिछोरापन की तो बू न रहेगी
हर लड़की गाजे बाजे से ब्याहेगी
उसे सांझ ढले पाउडर क्रीम थोपकर
चौखट पर खड़े हेाकर
किसी पुरुष को इशारे से
भीतर न बुलाना पड़ेगा,
तब पिता भाई
बहन बेटी को बेफिक्र होकर
कॉलेज भेज सकेगें
भीड़ में यहां वहां हाथ न धरे जायेगें
बेटियंा बोझ न होंगी
जवान होती बेटी के पिता को
जूतियां न घिसनी पड़ेगी,
पूरा घूंघट निकाले
घर का काम निबटा
ड्योढी में बैठी चरखा कातती
औरतें उसांस लेकर
धीमे धीमे बतियाती रहती
भरी दुपहरी,
तालाब के तीर
दम भर विश्राम करती
बतियाती
हमेशा ऐसे ही नही रहेगा
हम जैसी तकलीफें
हमारी लड़कियों को नही उठानी पडे़गी
तब लड़कियां हंसते हंसते ससुराल जायेगी
दहेज के ताने नही सुनने पड़ेगें
वह युग तो कुछ और ही होगा ,
क्या ऐसा ही है?????
...............किरण राजपुरोहित नितिला
बुधवार, 24 फ़रवरी 2010
उसका रंग कैसे भूलूं?
हर तरफ रंग है
हर कोई
रंग की बात कर रहा
सब रंगों से सरोबार है
रंग ही जीवन है
जीवन के लिये रंग है
पर
मेरा मन जाता उस ओर
जहां रंगों से
भरपूर खेली
लाल जोड़े में सजकर
गुलाबी रातें में निखर कर
हर रंग की खुशियां की रानी थी ,
किन्तु
अब
हाथों में रंग खोजती
नीले आसमां में कुछ तलाशती ,
सुनहरी भोर में झुलसती
रंगमयी सांझ में तपती
रंगों का अर्थ समझकर
आज बनी है अनजान
सफेद लिबास पहन कर !!!
एक रंग चुना है
उसके लिये
समाज ने
सफेद !सफेद !सफेद!
व्याख्या कहती है
सफेद है शांति
शांति में प्रेम
प्रेम में आनंद
आनंद में सब रंग
और सब रस
ही है
सृष्टि का मर्म ,
पर उसका सफेद रंग
कहता है
निर्लिप्त
वीतराग
दुख
पलायन
इच्छाओं की हत्या
एक कोना
और उसका अंधेरा
जीवन भर
काला गहरा!
एक जीवन
होनी के हाथों समा गया
और
एक जीवन
समाज लील लेने पर है उतारु
क्या होता यदि इसके विपरीत होता !!
......................किरण राजपुरोहित नितिला
शनिवार, 20 फ़रवरी 2010
कुछ मैं कहूं मुझसे ...........
कंकड़ उछालना
प्रकृति है उनकी
मैं देती हूं उससे
अपनी नींवों को मजबूती !
इसी डगर पड़ सकता है
कभी लौट आना
चलते हुये भी
कांटे हटाते जाना !
अजाने ही सांप को
दूध पिलाते हैं
फिर भी संभले
वही सयाने है!
शब्दों से तो
कम ही काम लेना
मन ही में गिनकर
गांठ बांध लेना !
तुम ही तो कहते थे
ठीक नही अविश्वास इतना
अब कहते हो
मौका देखकर झट रंग बदलना!
.................किरण राजपुरोहित नितिला
छू कर मेरे मन को
शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2010
छू कर मेरे मन को
.............. पक्षियों का कलरव शोर नही कहलाता क्योंकि जिस रव में अपनों से मिलने की उत्कंठा हो ,अपनों को सम्हालने का भाव हो सहयोग एवं प्रेम की उत्कठ पुकार हो वो शोर कैसे होगा।
...........पुस्तकें वे तितलियां है जो ज्ञान के पराकणें को एक मस्तिष्क से दूसरे मस्तिष्क तक ले जाती है।
............इस दुनिया में कुत्ता ही एक मात्र प्राणी है जो हमें स्वयं से अधिक प्यार करता है।
...........पुस्तकें वे तितलियां है जो ज्ञान के पराकणें को एक मस्तिष्क से दूसरे मस्तिष्क तक ले जाती है।
............इस दुनिया में कुत्ता ही एक मात्र प्राणी है जो हमें स्वयं से अधिक प्यार करता है।
गुरुवार, 18 फ़रवरी 2010
ईर्ष्या
ईर्ष्या
ईर्ष्या एक सहज भावना है और ईर्ष्यालु होना भी समान्य सी बात है लेकिन
एक ईर्ष्या होती है जो सफल लोगों के मूल्य अपनाकर हमें उनकी तरह बनने के लिए प्रेरित करती है ।यह ईर्ष्या का रचनात्मक पक्ष है जो किसी भी संस्कृति के विकास में संलग्न रचनात्मक लोगों केा आग बढने के लिए प्रेरित करता है।
ईर्ष्या की दूसरी किस्म नकारात्मक ईर्ष्या है जिसमें लोग दूसरों की सफलता से कुढते है और उनके खिलाफ नफरत से भरकर नकारात्मक कार्रवाई करने लगते है। ये नुकसानदेह होती है
अत यह जरुरी है कि न सिर्फ खुद दूसरों के प्रति ईर्ष्या करने से बचें बल्कि खुद को दूसरों की ईर्ष्या से सुरक्षित रखना भी सीखें। तब तक ईर्ष्या अपने रास्ते में रोड़ा नही अटकाती तब तक सब ठीक है लेकिन जब दूसरे हमारे खिलाफ अफवाहें फैलाएं हमारी सफलता को कम करने का प्रयास करे या कामयाबी की राह में रोड़े अटकानें लगें तो हम क्या करेगें?
तो उसके पास जाकर उसकी शुभकामनाएं लीजिये। उन्हें इसका एहसास कराइए कि हम उनके अधिकार क्षेत्र का हरण नही कर रहे है। अगर यह पैंतरा कामयाब न होतेा याद रखें कि उनके विरोध के कारण आपकी छवि निखरती जाती है । हिटलर ने यहूदियों का जबर्दस्त विरोध करके उनकी पहचान को मजबूत कर दिया। अनजानें मंे ही उसने उनकी पहचान को एक निश्चित स्वरुप दे दिया।
विरोधी से जूझने का एक तरीका यह है कि कोई प्रतिक्रया ही न की जाए। बेहतर होगा कि हम सामने वाले से बदला लेने की बजाय खुद को और अधिक मजबूत बनाएं। बदला लेने मंे हमारा वक्त जाएगा। ताकत कम होगी और तनाव बढेगा। दूसरों की ईर्ष्या से निपटने के लिए सबसे अहम बात यह जानना है कि ईर्ष्यालु व्यक्ति हमारे विचारो को खारिज करने के लिए कौनसे कदम उठाएगा। घाघ सबसे पहले तो हमारे विचारों की उपेक्षा करेगा। अगर उपेक्षा से वा खत्म हो गए तो ठीक है वरना वह हमारी बुराई करना शुरु कर देगा। अगर बुराई से भी काम नही चला तो फिर घाघ के पास उसे हमें अपनाने के अलावा कोई चारा नही रह जाता । अत जब भी हमारे किसी विचार की उपेक्षा की जाए उसे बीच में ही छेाड़ने की गलती कभी न करे। जिस समय उसकी बुराई हो तो हम प्रतिक्रया न करें क्योंकि हमारी रचनात्मकता को वांछित सम्मान जरुर मिलेगा । साथ ही अपनी दौलत और जीवनशैली के बारे में अपने से कमजोर लोगों की बीच श्ेाखी बघार कर ईर्ष्या पैदा करने की गलती न करंे। इसकी बजाय ईर्ष्यालु आदमी के सामने अपनी मुश्किलों की बात करके उसकी ईर्ष्या को कम करने की कोशिश करनी चाहिये। ..............अहा! जिंदगी से
ईर्ष्या एक सहज भावना है और ईर्ष्यालु होना भी समान्य सी बात है लेकिन
एक ईर्ष्या होती है जो सफल लोगों के मूल्य अपनाकर हमें उनकी तरह बनने के लिए प्रेरित करती है ।यह ईर्ष्या का रचनात्मक पक्ष है जो किसी भी संस्कृति के विकास में संलग्न रचनात्मक लोगों केा आग बढने के लिए प्रेरित करता है।
ईर्ष्या की दूसरी किस्म नकारात्मक ईर्ष्या है जिसमें लोग दूसरों की सफलता से कुढते है और उनके खिलाफ नफरत से भरकर नकारात्मक कार्रवाई करने लगते है। ये नुकसानदेह होती है
अत यह जरुरी है कि न सिर्फ खुद दूसरों के प्रति ईर्ष्या करने से बचें बल्कि खुद को दूसरों की ईर्ष्या से सुरक्षित रखना भी सीखें। तब तक ईर्ष्या अपने रास्ते में रोड़ा नही अटकाती तब तक सब ठीक है लेकिन जब दूसरे हमारे खिलाफ अफवाहें फैलाएं हमारी सफलता को कम करने का प्रयास करे या कामयाबी की राह में रोड़े अटकानें लगें तो हम क्या करेगें?
तो उसके पास जाकर उसकी शुभकामनाएं लीजिये। उन्हें इसका एहसास कराइए कि हम उनके अधिकार क्षेत्र का हरण नही कर रहे है। अगर यह पैंतरा कामयाब न होतेा याद रखें कि उनके विरोध के कारण आपकी छवि निखरती जाती है । हिटलर ने यहूदियों का जबर्दस्त विरोध करके उनकी पहचान को मजबूत कर दिया। अनजानें मंे ही उसने उनकी पहचान को एक निश्चित स्वरुप दे दिया।
विरोधी से जूझने का एक तरीका यह है कि कोई प्रतिक्रया ही न की जाए। बेहतर होगा कि हम सामने वाले से बदला लेने की बजाय खुद को और अधिक मजबूत बनाएं। बदला लेने मंे हमारा वक्त जाएगा। ताकत कम होगी और तनाव बढेगा। दूसरों की ईर्ष्या से निपटने के लिए सबसे अहम बात यह जानना है कि ईर्ष्यालु व्यक्ति हमारे विचारो को खारिज करने के लिए कौनसे कदम उठाएगा। घाघ सबसे पहले तो हमारे विचारों की उपेक्षा करेगा। अगर उपेक्षा से वा खत्म हो गए तो ठीक है वरना वह हमारी बुराई करना शुरु कर देगा। अगर बुराई से भी काम नही चला तो फिर घाघ के पास उसे हमें अपनाने के अलावा कोई चारा नही रह जाता । अत जब भी हमारे किसी विचार की उपेक्षा की जाए उसे बीच में ही छेाड़ने की गलती कभी न करे। जिस समय उसकी बुराई हो तो हम प्रतिक्रया न करें क्योंकि हमारी रचनात्मकता को वांछित सम्मान जरुर मिलेगा । साथ ही अपनी दौलत और जीवनशैली के बारे में अपने से कमजोर लोगों की बीच श्ेाखी बघार कर ईर्ष्या पैदा करने की गलती न करंे। इसकी बजाय ईर्ष्यालु आदमी के सामने अपनी मुश्किलों की बात करके उसकी ईर्ष्या को कम करने की कोशिश करनी चाहिये। ..............अहा! जिंदगी से
बुधवार, 10 फ़रवरी 2010
नम आँखें
नम आँखें
बोझिल नम आँखें
तलाश रही आशियाना,
ढूँढ -ढूँढ कर हैरान
जहां देखूँ
अनजाना आसमान,
ओस की बूँदों में
छिप-छिप कर हवायें
तेज हिलोरे दे रही
बरसात यूँ नहला रही
धूप यूँ सूखा रही,
पर रिमझिम से चमक रहे
रात के अंधियारे में
मेरी आशाओं के जुगनू
....रुचि राजपुरोहित तितिक्षा
बोझिल नम आँखें
तलाश रही आशियाना,
ढूँढ -ढूँढ कर हैरान
जहां देखूँ
अनजाना आसमान,
ओस की बूँदों में
छिप-छिप कर हवायें
तेज हिलोरे दे रही
बरसात यूँ नहला रही
धूप यूँ सूखा रही,
पर रिमझिम से चमक रहे
रात के अंधियारे में
मेरी आशाओं के जुगनू
....रुचि राजपुरोहित तितिक्षा
सोमवार, 8 फ़रवरी 2010
ओ मेरी सखी !!!!!
लड़कपन की स्मृति
स्नेहिल पुस्तक !
लिखे थे -जो
निष्कपट
निष्कलुष स्नेह के पृष्ठ
हमने
उन पृष्ठों में
बांचती हूं आज भी
दो रिबन फूलों वाली चोटियां
वो नीली स्कर्ट
घेर घूमेर होती !
बांचती हूं
वो भोली पर सरस बातें
वो हंसी ठिठोली
जो शाला के बाद भी
गुदगुदाती थी ,
मुहल्ले की सखियों में भी
जानी पहचानी थी
तुम सखी!
बातों की डोर से
वो भी बंध गई थी
तुमसे सखी,
पर
भीगती है आंखें
उस पृष्ठ पर आकर
जब मेरी भूल
अपने माथे ले खड़ी हुई थी
धूप में
पूरे दिन !!!
कुछ भी कहने न दिया
बस सहती रही सजा
सखी का कष्ट
असहय जो था तुम्हें ,
और मैं ?
मैं आज तक
अपराध बोधित सी
वह पृष्ठ
रोज बांचती हूं
कटघरे में खड़ी हूं
आज भी !
सोचती हूं
क्यूं मूक दर्शक बनी रही ,
सखी!
तुम्हारे नेह से अभिभूत हूं
आज तक,
भीगा रहता है
मेरा मन
आज भी
--------किरण राजपुरोहित नितिला
शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2010
कविता
किया जाये......
जाते हुये को
एक मुस्कुराहट से
विदा किया जाये जो
कहा सुना
उसे माफ किया जाये ,
बीती कड़वी बातों को
उड़ाकर
मीठी बातों को दिल से
लगाकर
जाते हुये को
थोड़ा रोक लिया जाये
जो खता गुनाह हो
माफ किया जाये ,
सभी दोस्त वापिस मिले
जरुरी नही
मन में फिर ऐसा गुल खिले
जरुरी नही
दोस्तों को रिश्तों में
न बांधा जाये
जो शिकायत हो
भुला दी जाये,
दिल की हर गांठ
जुबां पर
नही लाई जाती
गुस्ताखियां तो
अनचाहे ही हो जाती
हर कूसूर को
दिल पर न लगाया जाये ,
जो नाराजगियां है
सफा की जाये!!!
..............किरण राजपुरोहित नितिला
जाते हुये को
एक मुस्कुराहट से
विदा किया जाये जो
कहा सुना
उसे माफ किया जाये ,
बीती कड़वी बातों को
उड़ाकर
मीठी बातों को दिल से
लगाकर
जाते हुये को
थोड़ा रोक लिया जाये
जो खता गुनाह हो
माफ किया जाये ,
सभी दोस्त वापिस मिले
जरुरी नही
मन में फिर ऐसा गुल खिले
जरुरी नही
दोस्तों को रिश्तों में
न बांधा जाये
जो शिकायत हो
भुला दी जाये,
दिल की हर गांठ
जुबां पर
नही लाई जाती
गुस्ताखियां तो
अनचाहे ही हो जाती
हर कूसूर को
दिल पर न लगाया जाये ,
जो नाराजगियां है
सफा की जाये!!!
..............किरण राजपुरोहित नितिला
गुरुवार, 4 फ़रवरी 2010
छूकर मेरे मन को----------
पुरुष अथाह पानी को रोके खड़े बांध की तरह अपने दुखों को खुद में समाये रहता है । आसानी से न तो अपने भीतर किसी को झांकने देता है न ही दूसरे पुरुष का आसानी से आत्मीय बन पाता है परन्तु स्त्री की प्रकृति नाले के बंध की तरह होती है । तनिक प्रवाह से तट टूट जाते हैं। यही कारण है कि स्त्रियां पुरुषों की तुलना में अधिक जल्दी आत्मीय बन जाती है और दूसरे को आसानी से आत्मीय बना भी लेती है। इसी में स्त्रियों की सहनशीलता व लंबी आयु का राज छुपा है।
बुधवार, 3 फ़रवरी 2010
ऐसा भी होगा..............
ऐसा भी होगा..............
जिदंगी इतनी आसान
न होगी
हर मोड़ पर
कसौटियां होगी ,
उम्मीद से पहले
सोचना होगा
रिश्तों में कुछ
खामियां होगी ,
बहुत मुश्किल है
सब को खुश रखना
कहीं न कहीं
नाराजगियंा होगी,
मुस्कुराहट
हरदम साथ न होगी
कभी साथी
सिसकियां होगी,
किनारा ही न
मिलेगा सदा
मझधार में किश्तिया होगी
..........किरण राजपुरोहित नितिला
सोमवार, 1 फ़रवरी 2010
कविता
इक यह करना!!!
स्मृतियों को बस जिंदा रखना
अतीत से एक रिश्ता रखना
कितनी भी दूर चले जाओ
मिलने की एक जगह रखना
जीवन जायका कम न होगा
दिल में मीठी याद रखना
नन्हे नादान की भोली जिद
और बुजुर्गों की बात रखना
.........किरण राजपुरोहित नितिला
स्मृतियों को बस जिंदा रखना
अतीत से एक रिश्ता रखना
कितनी भी दूर चले जाओ
मिलने की एक जगह रखना
जीवन जायका कम न होगा
दिल में मीठी याद रखना
नन्हे नादान की भोली जिद
और बुजुर्गों की बात रखना
.........किरण राजपुरोहित नितिला
रविवार, 31 जनवरी 2010
कविता
इक पल.......
इक नन्हा सा पल
हो ,जो खोल दे
नये द्वार
नया राग
इक मिठास के साथ
जो घुलती रहे उम्र भर
सहज मित्रों में
और
दिप दिप रोशन होता रहे
मन आंगन
मह मह महकता रहे
मानसाकाश
स्वच्छता की धूप
खिल खिल कर
खोल दे
विचारों के नये सोपान
...............किरण राजपुरोहित नितिला
शनिवार, 30 जनवरी 2010
कविता
जब सच्चाई देखी
टूटे सारे भ्रम जब सच्चाई देखी
उथले पानी की गहराई देखी
व्यर्थ बातों के पहाडखड़े है
हवाओं की हाथापाई देखी
सोचने को मजबूर हुये जब
सज्जनों की जग हंसाई देखी
माजरा सब समझ आया जब
आवारों की पीठ थपथपाई देखी
इतिहास की आह निकल गई
जब हिन्दु मुस्लिम लड़ाई देखी
........किरण राजपुरोहित नितिला
मंगलवार, 26 जनवरी 2010
कविता
पिताजी!!!!!!
देखकर आपको!
पनिया गई आंखें
रुंध गया गला ,
आज
पैाळ तक पहंचने से पहले
नहीं सुनाई दी
वो दबंग
स्नेहसिक्त आवाज
आओ बेटाजी बाईसा !
कहकर उतावले
लेकिन दृढ कदमों से
खिंचे आते
और एक हाथ मेरे सिर रख
घड़ों आशीष देते
उस रुप की प्रतीक्षा में
टकरा गई
पुरानी खाट से ,
जहां धंसा था हड्डियों का ढांचा
जैसे तैसे ऐनक लगा
बेटा जी बाईसा को
पहचाना
किन्तु भरसक प्रयास करके भी
हाथ न
उठ सके मेरे सिर तक
आशीश के लिए
और बुदबुदाते रहे होंठ
कुछ अस्फुट सा!
आशीष था
या अपनी व्यथा?
जानती हूं कि
पिता हर रुप में
आर्शीवाद ही होते है,
और
कंापते रहे थे वे हाथ
जो थामे थे वंश वृक्ष केा
बलिष्ठ भुजायें उठ न सकी
जिनमें हम निश्चिंत हो झूले
झंझावतों से बेखबर
और निस्संग उंघा बचपन
अपनों का ही नही
गांव के दर्द को सहारा था,
वे आंखें जो
थर्रा देती थी
खड़े खडे़ ही आफतियों केा
धेाती की कलफ
लाठी की कड़क
और गर्जना भरी हुंकार
मान थी गांव का
भटकों की पगडंडी
दुखियों के धीर
वो घनी छांव
आज
क्यूं सिमट कर रह गई
एक ढांचा मोहताज सा!
............किरण राजपुरोहित नितिला
कविता
उसको .........
दनादन गोलियां बरसाते
बम फंेकते
याद नही आती उन्हें
अपने पिता की
मां की
जवानों का सीना छलनी करते
याद नही आती उन्हंे
अपनी प्रियतमा की?
जो उसकी बलिष्ठ छाती पर सिर रख
सारी दुनिया में
खुद केा महफूज समझती है
सपने देखती है
अपने भीतर प्रेम के अंकुर सहेजती है
और वह मुग्ध निहारता तनमन, जीवन जीता है
खून से सरोबार सीना ,
सपने में देख वह !
खुदा से खैर न मांगती होगी उसकी,
किसी के इंतजार को अंतहीन बना कर
वह
पत्नि के पास खुषी से लैाट जाता है
विजयी का दंभ भरकर
वह वैसा ही स्वागत कर पाती होगी?
या उस जवान की पत्नि को
अपने भीतर ही कलपता महसूस कर
उदास होती होगी !
जहां वह
थका मांदा पहंुच कर दम भरता है
चैन से उंघ लेता है
नई स्फूर्ति के लिये
मां दहलीज पर खड़ी
उसकी राह देख रही होती
और वह
दूर से ही अपना हाथ
लहराता
उड़ता सा आता
एक के बाद एक
स्वजन की खैरियत पूछ कर
सुख की सांस लेता होगा
रसोई से उठती खुष्बू से
मन हरा होता हेागा
तब ??
तब ???
क्या याद न आते होंगें वे घर
जहां वह अभी अभी बम रख कर आ रहा है !!!!!!
...............किरण राजपुरोहित नितिला
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