बुधवार, 19 अगस्त 2009


लहरें
मिलने केा आतुर
सिर पटक रोती,
निर्मोही धरती
बार बार परे धकेलती
प्यासी आंखेंा से
निहारता रहा चांद!
इठलाती हुई धरा
आगे बढ जाती ,
क्षितिज पर चूमती
आकाष को
वियोगियों को तड़पाती
खुद भी प्यासी रह जाती!
-किरण राजपुरोहित नितिला

1 टिप्पणी:

Shobha ने कहा…

बहुत ही शानदार है

"दर्द को यूँ अल्फाज़ देकर
संवारा है गहरायी का ताज देकर "