गुरुवार, 25 मार्च 2010

रोज सुबह होती है


   ये अंधेरे मैंने नहीं लिखे
फिर मेरे हिस्से क्यूं आये ?
हाथों की लकीरें तो मेरी थी
दूसरे की तकदीर कैसे जुड़ी ?
रेखाओं के गुत्थम गुत्था होने में उलझ गया सब कुछ
खिंचते तनते उलझते
आखिर टूट गये ,
पर चिंतित होना नहीं सीखा
ये विवशताओं की प्राचीर लांघ रही हूं
आज साफ सफफाक  हथेली
मेरा अपना अस्तित्व तलाशती है
अंखुआता एक सपना हूं मैं
नई धरा हूं
मेरे भीतर की दृढता पर पांव टिके है
बस यही दरकार है
नई इबारत लिखने को आतुर हूं मैं
उजाला तो हर सुबह चहचहाता है
अंजुरी भर बूंदें ओस की मेरे हिस्से में है
तभी तो रोज सुबह होती है!!    किरण राजपुरोहित नितिला

4 टिप्‍पणियां:

धीरज शाह ने कहा…

सुन्दर चित्र व कविता..

arvind ने कहा…

नई इबारत लिखने को आतुर हूं मैं
उजाला तो हर सुबह चहचहाता है
अंजुरी भर बूंदें ओस की मेरे हिस्से में है
तभी तो रोज सुबह होती है!!.....सुन्दर

Rs Diwraya ने कहा…

अँधियारा तुझे मिटाने आती हैँ रोज सुबह , जैसे आता हैँ हर दुःख के बाद सुख ।

Rs Diwraya ने कहा…

आपकी कविता