शनिवार, 3 अप्रैल 2010

 फिसलने का डर चलने नही देता
गिरने का डर संभलने नही देता


दंगे बंदूकों की दहशत, बारिश में
बच्चे को अब मचलने नही देता


सफेद लिबास उदास सूनी आंखें
आईना उसे  अब संवरने नही देता


 पींगें  उमंगें मन में बहुत उठती पर
खूंटा उसको  उछलने नही देता


हाथ बढाती है खुशियां अक्सर
समाज का डर संभलने नही देता .......

किरण राजपुरोहित नितिला

3 टिप्‍पणियां:

Shekhar kumawat ने कहा…

bas ye dar hi he jo hame kuch karne nahi deta

fir bhi hame us dar se nahi darna jo samj ke liye galat he


shekhar kumawat


http://kavyawani.blogspot.com/

गिरीश बिल्लोरे ने कहा…

वाह बेहतरीन है जी
सफेद लिबास उदास सूनी आंखें
आईना उसे अब संवरने नही देता

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" ने कहा…

वाह बहुत सुन्दर भाव हैं ...
सफेद लिबास उदास सूनी आंखें
आईना उसे अब संवरने नही देता
सुन्दर रचना है !