सोमवार, 3 मई 2010

कहना चाहती हूं

बहुत कुछ कहना चाहती हूं
जताना चाहती हूं
हवाओं से
गुलाबों से
खुश्बुओं से
जो  मन में है
कि तुम क्या हो !!!!!!!!
मेरे जीवन में ,
पर
कुछ कहना चाहूं
तो
होंठ संकोच से
सिमट कर रह जाते है
चुप सी छा जाती है
अर्थों पर
और वह चुप्पी
बयां कर देती है
जो लफ़जों  के बंधे किनारे
से बहुत अधिक
नीले आसमां तक
शून्य के चहुं ओर
फैल कर
पत्तों की
सर सर
भोर की खन खन
से भी अधिक
होती है !
तब सोचूं
तुम स्वर हो मेरे
और
मैं
तुम्हारा
मौन वर्णन !
.............किरण राजपुरोहित नितिला

5 टिप्‍पणियां:

दिलीप ने कहा…

नीले आसमां तक
शून्य के चहुं ओर
फैल कर
पत्तों की
सर सर
भोर की खन खन
से भी अधिक
होती है !
तब सोचूं
तुम स्वर हो मेरे
और
मैं
तुम्हारा
मौन वर्णन !
bahut hi nayab lekhni hai aapki kalam ko salaam...

nilesh mathur ने कहा…

सुन्दर रचना !

Shekhar Kumawat ने कहा…

sahi he bahut kuch janna chahte he

dekhana chahte he

bahut bahut badhai

shekhar kumawat

Jitendra Bagria ने कहा…

nice one mam !!!

chitrakshbhakhar ने कहा…

aapka blog dekha to hum aapke kayal hue.nasa es kadar saya aapke blog ka. hum padhte padhte ghayal hue.salaam kiran ji aapko ki net par bethe duniya ka safar suru huaa; ab aage dekhte hai.............................. salut