बुधवार, 9 फ़रवरी 2011

वो पुलकित धड़कन

वो पुलकित धड़कन
बीती खामोशियां
अब भी कसमसाती है
कूहूकना   चाहती है
शालीनता से
जो कभी बस
इक पल चहक कर
रह गई थी
संस्कारों के पैरों तले
वो नन्ही सी
कचनार  जैसी
 पुलकित धड़कन
 अब भी उनींदी है
डायरी के किसी पन्ने तले
और रह रह कर
झांक जाती है
मन के किसी
मोड़ पर
और मैं
 नजरअंदाज नहीं कर पाती !
.....किरण राजपुरोहित नितिला

8 टिप्‍पणियां:

Shobha ने कहा…

bahut khoob..

Shobha ने कहा…

bahut khoob..

Shobha ने कहा…

bahut khoob..

Shobha ने कहा…

bahut khoob..

Shobha ने कहा…

bahut khoob..

Richa P Madhwani ने कहा…

http;//shayaridays.blogspot.com

ana ने कहा…

BAHUT ACHCHHA LIKHA HAI AAPNE....BADHAI

somali ने कहा…

bahut khoob