रविवार, 2 अगस्त 2009


नियति..........


एक दिन
नियति
अपने नियत काम
छोड़ कर
कुछ बुनने बैठ गई
मखमली सुनहरी डोरी से
मेरा भाग्य लिख
सतरंगे तारें सी चुन्नटें डाल
रेष्मी धागे
से सहला दिया
मेरी छोटी सी मुलायम जिंदगी बुनी
गुलाबी दिन बुने
और
भीनी ख्ुष्बू की फुहार दे
दो घड़ी ठिठक निहरने लगी
सोच तनिक!
छत के बरामदे में कूंची ले खड़े
रंगों के छींटे से
और मोहक लगते
गोरे चिट्रटे लड़के पर फिरा दिया!
-----------किरण राजपुरोति नितिला

1 टिप्पणी:

Shobha ने कहा…

बहुत खूब...अगर समझें तो...