गुरुवार, 10 सितंबर 2009

नदी
स्ूखी नदी में बना
 यह घर
छाती में फफोला,
सीने में
फांस की तरह,
गर्दन तान कर
ठठाकर पैर पसारे हुये को,
 रोज देखती है
वह स्वयं को
निरंतर गंिदयाती ,
मसोस कर
उफ!
कर जाती है
और
स्वयं में ही
रह जाती है छटपटाकर ,
ििफर भी
सब कुछ भूल कर
ठिठकी सी रह जाती है
बच्चों की किलोल से !
उस घर का प्िरतरुप
कुछ सुखदायी है
सोच कर
उबाल पर छींटे पड़ जाते
 गुमसुम सी बिछ जाती है
धरती पर ,
धड़धड़ाहट से चैांक उठती है
 घ्ुमंतू पिहये
उसका सीना खोदने लगते है
फावड़ों -गैंितयों से
रोज हलाल होती है
भर भर तगारी
रेज़ा रेज़ा बिखेर दी जाती है
नींव में
निर्माण में
दीवार में
चंचल चपल
 खिलखिलाते कण
बांध दिये जाते हैं
चिनवा देते है
हवेिलयों तले,
सिसकती
कभी कभी वह
रेला बन बह निकलती है
 तकते हुये मकानों
फावड़ों केा
 लेिकन
कभी जब अट्ठाहास करती है तो
 समािहत कर लेती है
बहुत कुछ
अपने में
और
पटक देती है बहुत दूर
 किनारों को भी
ध्किया देती
बहुत पीछे
तट केा भी नद सा कर देती
खेतों को गड्डों में
बेरों को क्रोध से पाट देती है
 भरभराकर
फूटते है फफोले
 मेड़ें बिखर बिखर
घिसट जाती है दूर तक
क्षमा मांगती है
उनकी करतूतों की जो अब
सुख की नींद सो रहे है
------किरण राजपुराेिहत िनितला




1 टिप्पणी:

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' ने कहा…

'सलिल'-धार कलकल बहे, चट्टानों को चीर.
धरती माँ देती अमिय, मौन सहे हर पीर..