शनिवार, 19 सितंबर 2009





पहली बार ........ 
प्रथम स्पन्दन
जाने क्यूं आज
तेरा तकना
अच्छा लगा
जैसे सृिष्ट को
नई उमर लग गई हो
 समस्त उपवन ने
 जैसे नई देहरी में
कदम रखा हो
इन अनुभूितयों का
हदय में पहली बार
अंकुर फूटा
तुम्हारी उस
 सहज छुअन ने
 जैसे
मन उपवन
महका दिया
रोम रोम नयन बन
 तुमकेा निहारने को
आतुर हुआ
लेकिन
तुम्हारी अपलक दृिष्ट
और उसमें...........
!!!!!!!!!!!!!
संकोच का भार
ये पलकें न सह सकी
 झुक ही पड़ी
 न चाहते हुये भी,
लाज का रंग
मोहक लगता है !!
तुमने ऐसा ही कहा
था,
इस रंग की खुमारी
तुम्हारी सुर्ख आंखांे में
 छाती हुई
 मुझे ही चुराती रही!!!!!!!
जीवन का
वो मधुर स्पंदन
धड़कन से
वेा पहला पिरचय,
वे पल
आज भी
वैसे ही धड़कते है
मधुर स्मृित के पृष्ठों पर
........ििकरण राजपुराेिहत ििनितला






1 टिप्पणी:

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' ने कहा…

माँ धरती के गर्भ से, हुई प्रस्फुटित आस.
कलम कली कोमल 'सलिल', लिए नवल विश्वास..