शनिवार, 30 जनवरी 2010

कविता


जब सच्चाई देखी  

टूटे सारे भ्रम जब सच्चाई देखी
उथले पानी की गहराई देखी


व्यर्थ बातों के पहाडखड़े है  
हवाओं की हाथापाई देखी 


सोचने को मजबूर हुये जब
सज्जनों की जग हंसाई देखी


माजरा सब समझ आया जब
आवारों की पीठ थपथपाई देखी


इतिहास की आह निकल गई
जब हिन्दु मुस्लिम लड़ाई देखी


........किरण राजपुरोहित नितिला

7 टिप्‍पणियां:

Rakesh ने कहा…

टूटे सारे भ्रम जब सच्चाई देखी
उथले पानी की गहराई देखी
wah kiran bahut acha kaha aapne
uthle pani ki gehrai dekhi ..wah

Manish Kumar ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
Manish Kumar ने कहा…

व्यर्थ बातों के पहाड खड़े है
हवाओं की हाथापाई देखी


अच्छी लगी ये पंक्तियाँ !

Udan Tashtari ने कहा…

टूटे सारे भ्रम जब सच्चाई देखी
उथले पानी की गहराई देखी

-बढ़िया है.

वाणी गीत ने कहा…

व्यर्थ बातों के पहाड़ ...हवाओं की हाथा पाई ....शब्दों का अनूठा प्रयोग ...!!

anita ने कहा…

सोचने को मजबूर हुये जब
सज्जनों की जग हंसाई देखी
Bahut Bhadiya...Badhai!!

निर्मला कपिला ने कहा…

टूटे सारे भ्रम जब सच्चाई देखी
उथले पानी की गहराई देख
वैसे पूरी रचना ही लाजवाब है बधाई