मंगलवार, 5 मई 2009


निश्चय(कविता)
मेरे भीतर जब प्राण प्रक्रिया
प्रारंभ हुई तब
माँ की कोख में
विगत में भी हलचल हुई होगी,
मेरे भीतर के जीवांश् ने
रातों मँा को फिर जगाया होगा,
रह रह याद आये होगें
वो शब्द जो कुटुम्ब की
ओेरतें कह गई
जो आत्मीय जन ने कहे
जो गरम शीशे की मानिंद
कानों से हृदय को बेध गये;

नवजात क््रकंदन ने जब
उत्सुकता जगाई थी,
बूढ़ी दाई ने आंँचल हटा कुछ देखा और
मायूस सी मंत्रणा करने लगी गृहस्वामियों से,
भय व्याप्त हवा में सद्यः प्रसूता ने डूबते हृदय से
पहली और आखिरी बार सीने में भींचा था
नौ महीने सींचा वह प्राण पिंड
जो निर्दयता से झपटा जा चुका था,
निरीह,निस्तेज,बौराई मां
निर्जीव भांति विस्फारित आंखें पड़ी थी;
ठान चुकी थी किंतु इस बार
कर निश्चय अपार;

एक बार फिर ममत्व घोंटने की तैयारी थी
किंतु रौद्र दृश्टि से कंपा दिया था
नव प्रसूता वह चंडी सी,
हिला गई उस ्रकू्रर परंपरा को
सामंती खोखली जड़ों को
जिसने दंभ की खातिर
पीढ़ी की सीढ़ी को,
सृश्टि को रौंद डाला था,
आवरण बन छुपा लिया था
सृश्टि को
मनुष्यत्व को
एक वंश को
फौलादी फैसलों की खोह में,निस्तेज ,भयक्रांत खड़ा तक रहा था आडंबरी पुरूश वर्ग ----किरण राजपुरोहित‘नितिला’


1 टिप्पणी:

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

बहुत सुन्दर लगी यह रचना